Shri Pragyawar Pannalal Ji Maharaj

परम पूज्य प्राज्ञवर पन्नालाल जी महाराज

भारतीय समाज आध्यात्मिकता में रचा-बसा है, और इसकी संत परंपराएं अत्यंत पूजनीय हैं। हमारे संतों और तपस्वियों ने न केवल आध्यात्मिक साधना की, बल्कि सामाजिक एकता, निरक्षरता और सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन, पर्यावरण संरक्षण, राष्ट्रीय चेतना और शिक्षा के प्रसार में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

परम पूज्य प्राज्ञवर पन्नालाल जी महाराज ऐसे ही एक दिव्य संत थे, जिन्होंने जैन समाज को आध्यात्मिक मार्ग पर चलाया और साथ ही साथ सामाजिक सुधारों में भी सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने शिक्षा प्रसार, सामाजिक बुराइयों का उन्मूलन, स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्र जागरण, सांप्रदायिक सौहार्द, पर्यावरण संरक्षण और नशा मुक्ति जैसे क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान दिया।

आज उनके अनुयायी पूरे विश्व में फैले हुए हैं। उनके द्वारा स्थापित अनेक संस्थाएं शिक्षा, सामाजिक सेवा, चिकित्सा, साहित्य और नशा मुक्ति के क्षेत्रों में सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं।

आपका जन्म राजस्थान के नागौर ज़िले के कीटालसर गाँव में विक्रम संवत 1945, भाद्रपद सुदी 3 (शनिवार), 9 सितंबर 1888 को एक साधारण हिंदू माली परिवार में हुआ था। आपके पिता श्री बालूराम जी और माता श्रीमती तुलसा बाई जी कृषक थे। अल्पायु में ही सांसारिक वैराग्य की भावना जागृत हो गई थी और मात्र ग्यारह वर्ष की उम्र में आपने संत श्री मोतीलाल जी महाराज से दीक्षा ग्रहण की।

आपने हिंदी, संस्कृत, प्राकृत, और राजस्थानी भाषाओं का गहन अध्ययन किया और योग, न्याय, सांख्य, मीमांसा, वैशेषिक, वेदांत, जैन और बौद्ध दर्शन सहित विभिन्न दर्शनों का अध्ययन किया। आपके साहित्यिक योगदानों में जैन पर्व समालोचना, प्राज्ञ जिनागम द्विपंचशिका, प्राज्ञ पुंज, रक्षिका संबंध, भागचंद चरित्र, और शील सप्तमी आख्यान प्रमुख हैं।

आपका यह विश्वास था कि धर्म और संस्कृति का उत्थान केवल स्वतंत्र और सुरक्षित राष्ट्र में ही संभव है। इसी विचारधारा से प्रेरित होकर आपने स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्र समरसता का संदेश दिया। 1921 में जब नसीराबाद छावनी में धारा 144 लागू थी, आपने सदर बाज़ार पुलिस थाना के पास एक विशाल सर्वधर्म सभा को संबोधित किया और गौहत्या, अहिंसा और विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार जैसे विषयों पर ओजस्वी भाषण दिया। अंग्रेज अधिकारी, जिनमें कैन्टोनमेंट के कप्तान भी शामिल थे, आपको गिरफ़्तार करने में असफल रहे।

जैन साधु पैदल विहार करते हैं, जिससे वे आम जनजीवन को नज़दीक से समझते हैं। ऐसे ही पैदल विहार के दौरान महाराज जी ने कई सामाजिक बुराइयों को पहचाना और उनका समाधान किया। उन्होंने गाँवों के सरपंचों और रियासतों के शासकों को प्रेरित किया कि वे पत्ते, फ़रमान, राज्यादेश जारी कर मृत्युभोज, हिंसा, नशा, और पशु क्रूरता जैसी कुरीतियों को त्यागें। इनमें प्रमुख हैं:

  • देवलिया रियासत द्वारा ठाकुर विजय सिंह का पट्टा (5 अप्रैल 1929)
  • बनेड़ा राजा श्री अमर सिंह द्वारा पट्टा सं. 2160 (सितंबर 1931)
  • पीही राजा श्री माधव सिंह द्वारा पट्टा (सितंबर 1935)
  • रियान ठाकुर श्री गणपत सिंह द्वारा पट्टा (14 अप्रैल 1940)
  • मेड़ास रंजीत सिंह द्वारा पट्टा

गणहेड़ा और तिलोरा मंदिरों के शिलालेख आज भी अहिंसा, सामाजिक सुधार और पर्यावरण संरक्षण की उनकी भावना को प्रमाणित करते हैं।
उस समय जब राजस्थान में डकैतों का आतंक था, महाराज जी ने मोदी सिंह और खारवा के लक्ष्मण सिंह जैसे कुख्यात डकैतों को भी सुधारा और समाज की मुख्यधारा में वापस लाया।
आपकी करुणा आपदाओं के समय भी प्रकट हुई। आपने बंगाल के अकाल पीड़ितों की सहायता के लिए अपने अनुयायियों को प्रेरित किया। कच्छ के भूकंप (वि. सं. 2004) के समय भी आपने अनाज, वस्त्र और धन एकत्र कर राहत कार्यों में योगदान दिया।
शिक्षा के महत्व को समझते हुए, आपने पिछड़े क्षेत्रों में कई शैक्षिक संस्थाएं स्थापित कीं। आपके निर्वाण के पश्चात्, आपके शिष्यों ने यह कार्य आगे बढ़ाया और निम्नलिखित संस्थाएं स्थापित कीं:

  • श्री प्राज्ञ महाविद्यालय
  • श्री प्राज्ञ पब्लिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल, बिजयनगर
  • श्री प्राज्ञ पब्लिक स्कूल्स – भिनाय: बांदनवाड़ा, गुलाबपुरा, मसूदा
  • प्राज्ञ इंटरनेशनल स्कूल, बिजयनगर

इनका संचालन श्री प्राज्ञ जैन स्मारक समिति, बिजयनगर द्वारा किया जाता है। इसके अतिरिक्त:

  • श्री गांधी सीनियर सेकेंडरी स्कूल, गुलाबपुरा
  • श्री वर्धमान सीनियर सेकेंडरी स्कूल, भीलवाड़ा

 भी शिक्षा का प्रकाश फैला रहे हैं।

चिकित्सा सेवाएं निम्नलिखित संस्थानों द्वारा दी जा रही हैं:

  • श्री प्राज्ञ मिर्गी निवारण अस्पताल, गुलाबपुरा
  • श्री प्राज्ञ कुंदन वल्लभ हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर, बिजयनगर
  • गुरु पन्ना गवर्मेंट : हॉस्पिटल
  • सोहन हॉस्पिटल एंड सेवा संस्थान, अजमेर

आपके नाम से कार्यरत अन्य संस्थाओं में शामिल हैं:

 

  • श्री नानक जैन श्रावक समिति, बिजयनगर
  • श्री प्राज्ञ जैन संघ (दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, अहमदाबाद, सूरत, हैदराबाद)
  • श्री प्राज्ञ जैन मित्र मंडल (जयपुर, पाली, ब्यावर, भीलवाड़ा)
  • श्री प्राज्ञ जैन युवा मंडल (50 शाखाएँ)
  • श्री प्राज्ञ जैन किशोर, बालिका, महिला मंडल

ये सभी संस्थाएं सामाजिक सेवा, चरित्र निर्माण और शिक्षा प्रसार में सक्रिय हैं।

अन्य प्रमुख योगदानों में:

 

  • श्री प्राज्ञ गोशाला, सरवाड़ (गौ रक्षा)
  • श्री प्राज्ञ पुस्तकालय, भिनाय (पांडुलिपि संरक्षण)
  • श्री श्वेतांबर स्थानकवासी जैन स्वाध्यायी संघ, गुलाबपुरा (साहित्य व संस्कृति)
  • श्री प्राज्ञ प्राणी रक्षक संघ, गुलाबपुरा (पर्यावरण संरक्षण)

विभिन्न धर्मों और प्रांतों के हजारों लोग इन संस्थाओं से निरंतर लाभान्वित हो रहे हैं।
68 वर्षों की तपस्वी साधना और सेवा के उपरांत, परम पूज्य प्राज्ञवर पन्नालाल जी महाराज ने 3 फरवरी 1968 को बिजयनगर, जिला अजमेर में निर्वाण प्राप्त किया।